Monday, March 21, 2016

शीघ्रपतन

पालतू बनने के डर से,
जब कुछ आदमी  
औरतों की जांघों से निकल गए
वो,
कवि बन गए  
पर वो कवि,
जिनकी कविताओं के पाँव
मासिकधर्म
और गर्भपात जैसे शब्दों ने भारी किये
वो जो
मानने लगे कि
औरत के चंगुल से निकलकर
बुद्ध बना जाता है
पर जिनके रूपकों में
औरत की देह हावी रही  
वो जो
वैश्याओं से
हमदर्दी रखने के खेल के बाद
औरत के सिर्फ़ गर्म ख़याल  
अपने रूपकों में लाये
और फ़िर,
नायक बनकर
जाँघों से बाहर निकल आये
इतना कुछ कह गए वो  
औरतों के बारे में
फिर भी कैसे कहूं मैं ये
कि
ये उनके  
विचारों का शीघ्रपतन था  ?

-प्रकृति करगेती

Friday, March 4, 2016

जानकीपुल में एक नयी कहानी " प्यार का आकार "



 Test.



" प्यार का आकार ". 

<snip>
"प्यार कर बैठने का ख़ुमार, कई दिन उसके साथ रहा. वो प्यार जिससे ‘प्यार की परिभाषा’ लिखी गयी थी. पर प्यार कर बैठने के कुछ दिनों बाद प्यार हाथों से छूटता जाता था. ये बात ‘प्यार की परिभाषा’ में सोच समझकर नहीं लिखी गयी थी, या मिटा दी गयी थी, जैसे कोई गैरज़रूरी जानकारी जिसे अक्सर परिभाषाओं से दूर रखा जाता है. ये परिभाषा के संक्षिप्त होने का रिवाज है, जिसे प्यार के विस्तार पर भी लागू होना पड़ता है."

पूरी कहानी यहाँ पढ़िए: http://www.jankipul.com/2016/03/blog-post_5.html

Wednesday, March 2, 2016

गरम तवा

कुछ जला नहीं था अन्दर
बस धुआँ सा उठा था
जैसे कोई गरम तवा

गरम तवा ,
जिसपर कुछ सेका गया
बिन चिमटे के,
आग छुई
उँगलियों ने

जब सब कुछ सिक गया
सब कुछ पक गया
गरम तवे को
पानी की बौछार के नीचे रख दिया
जिससे उठा
ढेर सारा धुआँ,
जैसे ग़ुबार
जिसे ख़त्म हो जाना था

क्यूंकि
कुछ जला नहीं था अन्दर
बस धुआँ सा उठा था

जैसे कोई गरम तवा

-प्रकृति