पालतू बनने के डर से,
जब कुछ आदमी
औरतों की जांघों से निकल गए
वो,
कवि बन गए
पर वो कवि,
जिनकी कविताओं के पाँव
मासिकधर्म
और गर्भपात जैसे शब्दों ने भारी किये
वो जो
मानने लगे कि
औरत के चंगुल से निकलकर
बुद्ध बना जाता है
पर जिनके रूपकों में
औरत की देह हावी रही
वो जो
वैश्याओं से
हमदर्दी रखने के खेल के बाद
औरत के सिर्फ़ गर्म ख़याल
अपने रूपकों में लाये
और फ़िर,
नायक बनकर
जाँघों से बाहर निकल आये
इतना कुछ कह गए वो
औरतों के बारे में
फिर भी कैसे कहूं मैं ये
कि
ये उनके विचारों का शीघ्रपतन था ?
-प्रकृति करगेती


