Wednesday, July 6, 2016

छुट्टी संग मुट्ठीभर बासोट


बारिश से पहले 


जुलाई की शुरुआत है. यानी गर्मी की छुट्टियाँ ख़त्म. यानी स्कूल में सबसे पहले दिन बस्तों में बच्चे ढेर सारा होमवर्क लादकर ले गए होंगे. उनमें में से बहुतों को एक काम ज़रूर मिला होगा- निबंध लिखने का जिसका शीर्षक कुछ ऐसा होगा- “ गर्मी की छुट्टियाँ कैसे बितायीं” या “ How I spent my summer vacations”.


मुझे स्कूल छोड़े कई साल बीत गए हैं. कॉलेज छोड़े तीन साल. और नौकरी छोड़े एक महीना. करियर के इस पढ़ाव पर आकर आज मन किया कि नौकरी छोड़ने के बाद जो छुट्टियाँ मुझे मिली उनमें मैंने क्या किया ये लिख दूं. नौकरी में रहते बहुत कम छुट्टियाँ मिलती थी, भले ही कॉन्ट्रैक्ट में ढेरों लिखीं हों.


खैर...ये जो लम्बी छुट्टी मैंने ख़ुद को दी , उनमें मैंने क्या किया ? बहुत कुछ रोमांच भरा, जैसे पैराग्लाइडिंग, बंजी जंपिंग, राफ्टिंग वगैहरा कुछ भी नहीं. और न ही मैं निकली किसी अनजानी जगह की तलाश में. मैंने वो किया जो हर गर्मी की छुट्टियों में किया जाता था. सब लोग हिल स्टेशन निकल जाते हैं न. मैंने भी निकली एक हिल स्टेशन ( हाँ कुछ कुछ वैसा ही). मैं निकली अपने घर. जब भी घर जाते हैं, हम हमेशा ही कुछ देने के बजाये अपने साथ कुछ न कुछ ले आते हैं. मैं भी शहर आते आते, अपने साथ मुट्ठीभर बसोट ले आई हूँ. पर हाँ, आगे पढ़ने से पहले एक डिस्क्लेमर कि  आपको ऐसा कुछ नहीं मिलेगा-सुन्दर पर्वत श्रृंखलाओं का वर्णन, मेघों के घिर आने के बाद का दृश्य, लहलहाते खेतों की यादें वगैहरा वगैहरा.


हाँ, तो…


बसोट, ये उत्तराखंड प्रदेश के अल्मोडा जिले में स्थित एक छोटा सा गाँव है, जो अब धीरे धीरे एक कस्बे में तब्दील होता जा रहा है. आने वाले दस बीस सालों में बसोट एक शहर बन जाए, तो मुझे कोई हैरानी नहीं होगी. जैसे जैसे सड़कें बिझ्ती जाती हैं , सुविधाएं अपने आप आने लगती हैं. ऐसा ही कुछ बसोट के साथ भी होगा ( या हो रहा है), ये मेरा अनुमान है. पहाड़ों से पलायन की बातें जो हम सुनते आ रहे हैं, वो शायद कम हों. सभी कुछ वहीँ मिल जाया करेगा तो लोग बाहर क्यूँ जायेंगे ? पर ये सब मैं ख़ुद शहर में बैठकर लिख और सोच रही हूँ. आज भी छोटे से छोटा , और बड़े से बड़ा मर्ज़ हो तो माँ या पिताजी के लिए हम शहरों के अस्पतालों के ही चक्कर काटते हैं. वैसे बसोट में  एक प्राथमिक स्वास्थ केंद्र भी है, जैसा किसी भी सुविधा-संपन्न गाँव में होता है. पर कहते हैं कि वहाँ डॉक्टर भी बस मेरी तरह गर्मियों की छुट्टी मनाने आता है. बाक़ी दिन नदारद. हाँ, वो भी बिलकुल मेरी तरह !


अब है तो गाँव ही, इसलिए खेत खलिहान सब कुछ होंगे ही . पर सवाल है कि वहाँ लगता क्या है, उगता क्या है. मेरी माँ, जिसने अपने दो बगीचों और एक खेत को बड़ी मेहनत से सींचा है, उसके अपने तर्क हैं. उसके हिसाब से उगता सब कुछ है, पर बचता बस उतना ही है जो बंदरों के हाथों से छूट जाए. या आवारा घूमती गायों से. पर मैंने बाकियों की बात सुनने समझने की कोशिश करी तो पता चला कि ये तर्क सभी का है. असल में वहाँ मक्कैक्स बंदरों की तादाद बहुत बढ़ गयी है. वो अकसर सुबह और दोपहर को खेतों में जा जाकर खूब उधम मचाते हैं और जो हाथ लगता है, उसे नोचकर खा जाते हैं. और कुछ जो छूट जाता है, वो होते हैं, आधे खाए, बेदर्दी से नोचे हुए पत्ते या फल और कुछ टूटी टहनियां जिनपर उनके डरावने दांतों के निशाँ होते हैं. और ऐसा रोज़ होता है, कम से कम दिन में दो बार.

आम का बगीचा 


इस बार आम की फ़सल बहुत अच्छी हुई थी, जिन्हें बन्दर और इंसान दोनों ही से बचाना था. इसलिए इस बार मुझे बगीचों की निगरानी करने की ज़िम्मेदारी मिली थी. ये काम मुझे अच्छा जान पड़ा क्यूंकि पढ़ते-लिखते भी ये काम किया जा सकता था. बगीचे के पास का एक कमरा मुझे दिया गया था, जहाँ मैंने सभी किताबें लाकर रख दी थी. और खेत को निकलती सीढ़ियों पर बैठकर उन्हें पढ़ा करती थी . आने जाने वाले लोगों  को मैं एक स्मारक बनी मिलती. आते जाते लोगों को लगता था कि मैं किसी गहन अध्ययन में लगी हुई हूँ. कभी कभी उनसे बातें भी होती थी.



एक बूढ़े आदमी से एक संवाद याद आता है. वो शाम के वक़्त अपने घर को निकले थे. घर का रास्ता सीढ़ियों के पास से ही गुज़रता है. उस वक़्त जब माँ, पिताजी और मैं सीढ़ियों पर बैठे चाय पी रहे थे तो वो जाते जाते रुक गए और माँ और पिताजी से कहा “और बैठ र छा ? ” ( और बैठे हो ?). वैसे इस सवाल का कोई असल जवाब नहीं है. पर आने जाने वाले लोग ‘कुछ न कहने’ के अटपटे को काटने के लिए कुछ कुछ कहकर चले जाते हैं. जैसे ये वाक्य. और कभी कोई जवाब जानने की इच्छा के बिना ही पूछता है “ के काम ला रछा?” ( क्या काम कर रहे हो) या कोई पूछता है “ रॉट पलटा हैली?” ( रोटियाँ बन गयी ?) इत्यादि !


तो ऐसे ही इन सज्जन ने  हमसे पूछा “ और बैठ रछा?”.

धनीराम 

और ये कहते हुए ख़ुद भी हमारे सामने बैठ गए. उन्होंने बीडी निकाली और जला ही रहे थे कि पिताजी ने चुटकी लेते हुए कहा “अब नन-नातिन वाव है गेछा, अब छोड़ दियो य सब” ( अब नाती पोते वाले हो गए हो, अब तो छोड़ दो ये सब ). इस पर वो थोड़ा मुस्कुराये और तपाक से बोले “ तुम बामन आदीम हया, तुम सब काम पातड़ देख बे करछा. हम बिडी शराब सब आपण मनल करनू.” ( तुम ब्राह्मण आदमी हो, सब कुछ पंचांग देखकर करते तो. हम बीडी शराब सब अपनी मर्ज़ी से पीते हैं).  इस बात पर हम सब हंस दिए. बात तो ठीक ही थी.


माँ ने उनके जाने के बाद बताया कि उनका नाम धनीराम है. मुझे तब समझ में आया कि वो कहाँ जा रहे थे. वो जा रहे थे- 'डूम बाखई' यानी डूमों के मौहल्ले की ओर. कुमाऊँनी में हरिजन को ‘डूम’ कहते हैं. मैंने पहाड़ में जातिवाद की छाप जितनी गहरी देखी है, उतनी कहीं नहीं देखी. मुझे धनीराम के मज़ाक में पुराने अनुभवों की बू आई. उनका मज़ाक ब्राह्मणों पर एक सटीक कटाक्ष था, क्यूंकि ऐसा नहीं था कि व्यसन सिर्फ़ कुछ जातियों तक सीमित थे. ब्राह्मण भी उनसे उतना ही रस लेते हैं, जितना कि बाकी सब. फ़र्क बस इतना है कि वो व्यसनों को करने का अपना एक मुहूर्त निकालते हैं.


खैर...इस निगरानी के बीच मेरा अध्ययन चलता रहा. बारिश के बाद टूटे आमों को माँ ने सुखाने रखा था. उन्हीं कच्ची कैरियों को चुराकर खाते खाते  कुछ लिखा और बहुत कुछ पढ़ा.


अमचूर


पॉल गोमरा का स्कूटर, क्रूज़र सोनाटा, मंटों की कहानियाँ, चेरी का बगीचा इन्हीं सब में मन रम गया था. आषाढ़ शुरू हुआ तो अनजाने में( या अवचेतन रूप से पचांग देखकर)  ‘आषाढ़ का एक दिन’ भी पढ़ा. एक या दो घंटे, जितना भी समय इसे पढ़ते हुए लगा होगा, उतने समय के लिए मैं किसी और दुनिया में पहुँच चुकी थी. शाम की चाय पर इसपर चर्चा चली. माँ ने बहुत कुछ बताया कालिदास के बारे में. और ये पंक्तियाँ सुनाई -


“ सूर सूर तुलसी शशि, उड्गन केशव दास,
अब के कवि  खद्दयोत सम, जहं-तहं करत प्रकाश”


और कहा कि कालिदास भी ‘तब’ के कवि माने जा सकते थे, पर….मैंने इस ‘पर' के आगे पड़ताल नहीं करी. लेकिन हाँ, 'कुमारसंभव' पर जल्द ही धावा बोला जायेगा, ये निश्चय किया.


वैसे इस बीच गाँव में रामलीला खेली जा रही. वो भी हमारे बगीचे के ऊपर वाले खेत में. जितने दिन घर पर थी, मम्मी और मैं रामलीला का लेट-नाईट शो देखने जाते थे. पर मेरी माँ की शिकायत रहती थी कि मैं ज़रूरी संवादों में सो जाया करती थी. जैसे 'लक्ष्मण और परशुराम संवाद' में मैं आधे में सो गयी थी. पर मुझे कोई मलाल नहीं है. क्यूंकि उसमें रामलीला का वो फ्लेवर नहीं था, जिसे में ढूढ़ने गयी थी. वो फल्वौर था-गाँव का फ्लेवर, जिसमें हम किसी पात्र को देखकर चिल्लाते हैं, और कहते हैं “ अरे ये तो सामने वाले ख्यालीराम दर्जी का सबसे छोटा बेटा है!!” और ये  हम ही नहीं चिल्लाते, पूरा गाँव चिल्लाता है. तो ये फ्लेवर मिला हमें दसरथ के मरने पर. जैसे ही कैकयी दसरथ के पाँव पर गिरकर फूट फूटकर रोने लगी, दर्शकों की सीटियों और तालियों के बीच उसका विलाप बिलकुल दब गया. कैकयी बने थे हमारे गाँव की बस के कंडक्टर ‘बीरू’ दा.
मंथरा, कैकयी, भरत, शत्रुघन
ये कहना मुश्किल था कि उन्होंने अपना किरदार कैसे निभाया. उस दिन जब हम वापस आ रहे थे तो पात्रों को मिले इनाम की घोषणा हो रही थी, तब हमने सुना कि कैकयी के पात्र का नाम कहीं नहीं था. हो सकता है, बाद में मिला हो. पर क्या एक आदमी औरत के इस चरित्र को भला इतनी सिद्दत से निभा सकता है ? यूँ तो निर्मल पाण्डेय को एक इतालवी फ़िल्म में ‘ Best Actress Award’ मिला था. पर फ़िर भी क्या अब वक़्त नहीं आ गया है कि गाँवों की रामलीला में भी औरतें ही औरतों के किरदार निभाएं ? खैर , इसपर तो लम्बी बहस हो जाएगी. वो फ़िर कभी.

लेख के अंत पर पहुँचकर लग रहा है कि मुट्ठी ज़्यादा ही भर ली. और जैसे मैंने कहा, कि देने के लिए कुछ नहीं था. जितना देखा सुना, उसे मैं साथ ले आई हूँ. बहुत कुछ है जो कहना है. आज एक ब्लॉग पोस्ट है, कल कोई और रूप होगा.
इन बीते हफ़्तों की यादें और पकेंगी तो और भी कुछ लिखा जायेगा. अभी के लिए फ़िर से अंतराल.


दयौ (बारिश)