Thursday, November 10, 2016

शुन्तारो तानीकावा की दो कवितायेँ

कई दोस्तों के सुझाव के बाद, मैंने अनुवाद की तरफ़ पहला कदम बढ़ाया है. पर शुरू करने से पहले भी ये मैं जानती थी की अनुवाद टेड़ी खीर है. इत्र की बोतलें बदलने वाली बात भी सुनी थी. भाषांतरण होने के बाद भी, भावांतरण नहीं होने का डर रहता. अभी भी है.

पहले सोचा वेरा पाव्लोवा की कविताओं का अनुवाद करूँ. पर जब भी उनकी कविताओं के साथ बैठी, तो शब्दों के अर्थों को सही तरह निचोड़ने में कविता कहीं गुम हो जाती. फ़िर सोचा बोर्गेस की कुछ कविताओं का अनुवाद करूँ. उनकी कवितायेँ पढ़कर मूल अर्थ समझ आया, पर उनका गूढ़ अर्थ पकड़ने में अभी समय है, ये भी समझ में आया. किसीने मुझसे ये कहा भी कि ‘कुछ चीज़ें उम्र के लिए छोड़ दो’. सो, मैंने छोड़ दी.


हर कवि की कविता का अपना डीएनए होता है. उसकी लेखनी में उसकी छाप पकड़ पाने में समय लगता है. और उसकी आवाज़ किसी और भाषा में उतारने में उससे ज़्यादा समय. पर फ़िर भी, अनुवाद की तरफ़ दिमाग को खुला रखा. और मेरा वो ‘यूरेका’ क्षण तब आया जब कुछ हफ़्तों पहले ‘गार्डियन’ में एक लेख पढ़ा. शुन्तारो तानीकावा की एक कविता छपी थी- “एंड”. कविता की सरलता मुझे बहुत पसंद आई. ये शुन्तारो का मेरे लिए पहला परिचय था, जिसे मैंने अपना पहला अनुवाद भी बनाया है. पढ़कर बताइए कि इन कविताओं की दो बोतलों से कितनी महक उड़ गयी और कितनी बची रह गयी.

और फ़िर...
ग्रीष्म के आने पर
झिंगूर गाने लगेंगे
फ़िर से

आतिशबाज़ियाँ
ज़हन में
जम जाएँगी

दूर के देश
सब धूमिल हैं
पर पूरा ब्रह्माण्ड
मेरी नाक की सीध में साफ़ दिखता है

ये भी एक वरदान है
कि कुछ लोग
मर जाते हैं 
पीछे छोड़
बस एक संयोजन
“और फ़िर…”

संगीत एक बार फिर

कहीं किसीने एक दिन
पियानो बजाया.
वो आवाज़ समय और अधर से परे मेरे कानों को सहलाती है
जिसका कम्पन आज भी हवा में है  

बहुत दूर से कहीं एक मीठी सरसराहट-
पर उसका अर्थ मेरी समझ के परे है.
मैं बस खुद को उन्हें सौंप सकता हूँ,
जंगल के पेड़ों की तरह
जो हवा के साथ हिलते जाते हैं

पहला नाद कब जन्मा ?
खाली ब्रह्माण्ड के बीचों बीच
किसी ने जैसे गूढ़ और गुप्त
सन्देश भेजा हो

संगीत किसी जीनियस की कृति नहीं.  
उन्होंने केवल अर्थों के लिए कान बंद कर लिए
और बस विनम्रता से सुना उस ख़ामोशी को
जो अनंत काल से मौजूद है