Thursday, November 10, 2016

शुन्तारो तानीकावा की दो कवितायेँ

कई दोस्तों के सुझाव के बाद, मैंने अनुवाद की तरफ़ पहला कदम बढ़ाया है. पर शुरू करने से पहले भी ये मैं जानती थी की अनुवाद टेड़ी खीर है. इत्र की बोतलें बदलने वाली बात भी सुनी थी. भाषांतरण होने के बाद भी, भावांतरण नहीं होने का डर रहता. अभी भी है.

पहले सोचा वेरा पाव्लोवा की कविताओं का अनुवाद करूँ. पर जब भी उनकी कविताओं के साथ बैठी, तो शब्दों के अर्थों को सही तरह निचोड़ने में कविता कहीं गुम हो जाती. फ़िर सोचा बोर्गेस की कुछ कविताओं का अनुवाद करूँ. उनकी कवितायेँ पढ़कर मूल अर्थ समझ आया, पर उनका गूढ़ अर्थ पकड़ने में अभी समय है, ये भी समझ में आया. किसीने मुझसे ये कहा भी कि ‘कुछ चीज़ें उम्र के लिए छोड़ दो’. सो, मैंने छोड़ दी.


हर कवि की कविता का अपना डीएनए होता है. उसकी लेखनी में उसकी छाप पकड़ पाने में समय लगता है. और उसकी आवाज़ किसी और भाषा में उतारने में उससे ज़्यादा समय. पर फ़िर भी, अनुवाद की तरफ़ दिमाग को खुला रखा. और मेरा वो ‘यूरेका’ क्षण तब आया जब कुछ हफ़्तों पहले ‘गार्डियन’ में एक लेख पढ़ा. शुन्तारो तानीकावा की एक कविता छपी थी- “एंड”. कविता की सरलता मुझे बहुत पसंद आई. ये शुन्तारो का मेरे लिए पहला परिचय था, जिसे मैंने अपना पहला अनुवाद भी बनाया है. पढ़कर बताइए कि इन कविताओं की दो बोतलों से कितनी महक उड़ गयी और कितनी बची रह गयी.

और फ़िर...
ग्रीष्म के आने पर
झिंगूर गाने लगेंगे
फ़िर से

आतिशबाज़ियाँ
ज़हन में
जम जाएँगी

दूर के देश
सब धूमिल हैं
पर पूरा ब्रह्माण्ड
मेरी नाक की सीध में साफ़ दिखता है

ये भी एक वरदान है
कि कुछ लोग
मर जाते हैं 
पीछे छोड़
बस एक संयोजन
“और फ़िर…”

संगीत एक बार फिर

कहीं किसीने एक दिन
पियानो बजाया.
वो आवाज़ समय और अधर से परे मेरे कानों को सहलाती है
जिसका कम्पन आज भी हवा में है  

बहुत दूर से कहीं एक मीठी सरसराहट-
पर उसका अर्थ मेरी समझ के परे है.
मैं बस खुद को उन्हें सौंप सकता हूँ,
जंगल के पेड़ों की तरह
जो हवा के साथ हिलते जाते हैं

पहला नाद कब जन्मा ?
खाली ब्रह्माण्ड के बीचों बीच
किसी ने जैसे गूढ़ और गुप्त
सन्देश भेजा हो

संगीत किसी जीनियस की कृति नहीं.  
उन्होंने केवल अर्थों के लिए कान बंद कर लिए
और बस विनम्रता से सुना उस ख़ामोशी को
जो अनंत काल से मौजूद है  

Wednesday, August 3, 2016

A long piece for Your Story: Project Chirag


Providing solar lighting to more than 60,000 villagers across 10,000 households – the Project Chirag way





<snip>
“It was tough to raise funds. But the idea was unique… a college student can afford to give Rs 10. It could mean not having a packet of chips for lunch, or taking a train to college instead of a taxi….so the idea was well received. The project was highly successful”, says Ayesha.
A project that started with a few students has today turned into the ‘Chirag Light India Movement’ that has also spread across multiple colleges and schools in India.

Tuesday, August 2, 2016

'ज़रा हट के' फ़िल्मों का दौर

"कयास लगाया जा रहा है कि 'ऑन-डिमांड कंटेंट' की होड़ में डिजिटल दुनिया के लिए शॉर्ट फिल्मों से लेकर फीचर फिल्मों तक, सब कुछ बनाया जाएगा.
गौर करने की बात ये भी है कि आज जहां कई निर्माता, निर्देशक नेटफ्लिक्स के आने का जश्न मना रहे हैं, वहीं देश का एक हिस्सा अपने शहर में टिकट न मिलने के कारण रजनीकांत की फ़िल्म 'कबाली' देखने फ्लाइट से दूसरे शहर भी जा रहा है.
तो वक़्त बदलने में अभी कितना वक़्त है?" 








Wednesday, July 6, 2016

छुट्टी संग मुट्ठीभर बासोट


बारिश से पहले 


जुलाई की शुरुआत है. यानी गर्मी की छुट्टियाँ ख़त्म. यानी स्कूल में सबसे पहले दिन बस्तों में बच्चे ढेर सारा होमवर्क लादकर ले गए होंगे. उनमें में से बहुतों को एक काम ज़रूर मिला होगा- निबंध लिखने का जिसका शीर्षक कुछ ऐसा होगा- “ गर्मी की छुट्टियाँ कैसे बितायीं” या “ How I spent my summer vacations”.


मुझे स्कूल छोड़े कई साल बीत गए हैं. कॉलेज छोड़े तीन साल. और नौकरी छोड़े एक महीना. करियर के इस पढ़ाव पर आकर आज मन किया कि नौकरी छोड़ने के बाद जो छुट्टियाँ मुझे मिली उनमें मैंने क्या किया ये लिख दूं. नौकरी में रहते बहुत कम छुट्टियाँ मिलती थी, भले ही कॉन्ट्रैक्ट में ढेरों लिखीं हों.


खैर...ये जो लम्बी छुट्टी मैंने ख़ुद को दी , उनमें मैंने क्या किया ? बहुत कुछ रोमांच भरा, जैसे पैराग्लाइडिंग, बंजी जंपिंग, राफ्टिंग वगैहरा कुछ भी नहीं. और न ही मैं निकली किसी अनजानी जगह की तलाश में. मैंने वो किया जो हर गर्मी की छुट्टियों में किया जाता था. सब लोग हिल स्टेशन निकल जाते हैं न. मैंने भी निकली एक हिल स्टेशन ( हाँ कुछ कुछ वैसा ही). मैं निकली अपने घर. जब भी घर जाते हैं, हम हमेशा ही कुछ देने के बजाये अपने साथ कुछ न कुछ ले आते हैं. मैं भी शहर आते आते, अपने साथ मुट्ठीभर बसोट ले आई हूँ. पर हाँ, आगे पढ़ने से पहले एक डिस्क्लेमर कि  आपको ऐसा कुछ नहीं मिलेगा-सुन्दर पर्वत श्रृंखलाओं का वर्णन, मेघों के घिर आने के बाद का दृश्य, लहलहाते खेतों की यादें वगैहरा वगैहरा.


हाँ, तो…


बसोट, ये उत्तराखंड प्रदेश के अल्मोडा जिले में स्थित एक छोटा सा गाँव है, जो अब धीरे धीरे एक कस्बे में तब्दील होता जा रहा है. आने वाले दस बीस सालों में बसोट एक शहर बन जाए, तो मुझे कोई हैरानी नहीं होगी. जैसे जैसे सड़कें बिझ्ती जाती हैं , सुविधाएं अपने आप आने लगती हैं. ऐसा ही कुछ बसोट के साथ भी होगा ( या हो रहा है), ये मेरा अनुमान है. पहाड़ों से पलायन की बातें जो हम सुनते आ रहे हैं, वो शायद कम हों. सभी कुछ वहीँ मिल जाया करेगा तो लोग बाहर क्यूँ जायेंगे ? पर ये सब मैं ख़ुद शहर में बैठकर लिख और सोच रही हूँ. आज भी छोटे से छोटा , और बड़े से बड़ा मर्ज़ हो तो माँ या पिताजी के लिए हम शहरों के अस्पतालों के ही चक्कर काटते हैं. वैसे बसोट में  एक प्राथमिक स्वास्थ केंद्र भी है, जैसा किसी भी सुविधा-संपन्न गाँव में होता है. पर कहते हैं कि वहाँ डॉक्टर भी बस मेरी तरह गर्मियों की छुट्टी मनाने आता है. बाक़ी दिन नदारद. हाँ, वो भी बिलकुल मेरी तरह !


अब है तो गाँव ही, इसलिए खेत खलिहान सब कुछ होंगे ही . पर सवाल है कि वहाँ लगता क्या है, उगता क्या है. मेरी माँ, जिसने अपने दो बगीचों और एक खेत को बड़ी मेहनत से सींचा है, उसके अपने तर्क हैं. उसके हिसाब से उगता सब कुछ है, पर बचता बस उतना ही है जो बंदरों के हाथों से छूट जाए. या आवारा घूमती गायों से. पर मैंने बाकियों की बात सुनने समझने की कोशिश करी तो पता चला कि ये तर्क सभी का है. असल में वहाँ मक्कैक्स बंदरों की तादाद बहुत बढ़ गयी है. वो अकसर सुबह और दोपहर को खेतों में जा जाकर खूब उधम मचाते हैं और जो हाथ लगता है, उसे नोचकर खा जाते हैं. और कुछ जो छूट जाता है, वो होते हैं, आधे खाए, बेदर्दी से नोचे हुए पत्ते या फल और कुछ टूटी टहनियां जिनपर उनके डरावने दांतों के निशाँ होते हैं. और ऐसा रोज़ होता है, कम से कम दिन में दो बार.

आम का बगीचा 


इस बार आम की फ़सल बहुत अच्छी हुई थी, जिन्हें बन्दर और इंसान दोनों ही से बचाना था. इसलिए इस बार मुझे बगीचों की निगरानी करने की ज़िम्मेदारी मिली थी. ये काम मुझे अच्छा जान पड़ा क्यूंकि पढ़ते-लिखते भी ये काम किया जा सकता था. बगीचे के पास का एक कमरा मुझे दिया गया था, जहाँ मैंने सभी किताबें लाकर रख दी थी. और खेत को निकलती सीढ़ियों पर बैठकर उन्हें पढ़ा करती थी . आने जाने वाले लोगों  को मैं एक स्मारक बनी मिलती. आते जाते लोगों को लगता था कि मैं किसी गहन अध्ययन में लगी हुई हूँ. कभी कभी उनसे बातें भी होती थी.



एक बूढ़े आदमी से एक संवाद याद आता है. वो शाम के वक़्त अपने घर को निकले थे. घर का रास्ता सीढ़ियों के पास से ही गुज़रता है. उस वक़्त जब माँ, पिताजी और मैं सीढ़ियों पर बैठे चाय पी रहे थे तो वो जाते जाते रुक गए और माँ और पिताजी से कहा “और बैठ र छा ? ” ( और बैठे हो ?). वैसे इस सवाल का कोई असल जवाब नहीं है. पर आने जाने वाले लोग ‘कुछ न कहने’ के अटपटे को काटने के लिए कुछ कुछ कहकर चले जाते हैं. जैसे ये वाक्य. और कभी कोई जवाब जानने की इच्छा के बिना ही पूछता है “ के काम ला रछा?” ( क्या काम कर रहे हो) या कोई पूछता है “ रॉट पलटा हैली?” ( रोटियाँ बन गयी ?) इत्यादि !


तो ऐसे ही इन सज्जन ने  हमसे पूछा “ और बैठ रछा?”.

धनीराम 

और ये कहते हुए ख़ुद भी हमारे सामने बैठ गए. उन्होंने बीडी निकाली और जला ही रहे थे कि पिताजी ने चुटकी लेते हुए कहा “अब नन-नातिन वाव है गेछा, अब छोड़ दियो य सब” ( अब नाती पोते वाले हो गए हो, अब तो छोड़ दो ये सब ). इस पर वो थोड़ा मुस्कुराये और तपाक से बोले “ तुम बामन आदीम हया, तुम सब काम पातड़ देख बे करछा. हम बिडी शराब सब आपण मनल करनू.” ( तुम ब्राह्मण आदमी हो, सब कुछ पंचांग देखकर करते तो. हम बीडी शराब सब अपनी मर्ज़ी से पीते हैं).  इस बात पर हम सब हंस दिए. बात तो ठीक ही थी.


माँ ने उनके जाने के बाद बताया कि उनका नाम धनीराम है. मुझे तब समझ में आया कि वो कहाँ जा रहे थे. वो जा रहे थे- 'डूम बाखई' यानी डूमों के मौहल्ले की ओर. कुमाऊँनी में हरिजन को ‘डूम’ कहते हैं. मैंने पहाड़ में जातिवाद की छाप जितनी गहरी देखी है, उतनी कहीं नहीं देखी. मुझे धनीराम के मज़ाक में पुराने अनुभवों की बू आई. उनका मज़ाक ब्राह्मणों पर एक सटीक कटाक्ष था, क्यूंकि ऐसा नहीं था कि व्यसन सिर्फ़ कुछ जातियों तक सीमित थे. ब्राह्मण भी उनसे उतना ही रस लेते हैं, जितना कि बाकी सब. फ़र्क बस इतना है कि वो व्यसनों को करने का अपना एक मुहूर्त निकालते हैं.


खैर...इस निगरानी के बीच मेरा अध्ययन चलता रहा. बारिश के बाद टूटे आमों को माँ ने सुखाने रखा था. उन्हीं कच्ची कैरियों को चुराकर खाते खाते  कुछ लिखा और बहुत कुछ पढ़ा.


अमचूर


पॉल गोमरा का स्कूटर, क्रूज़र सोनाटा, मंटों की कहानियाँ, चेरी का बगीचा इन्हीं सब में मन रम गया था. आषाढ़ शुरू हुआ तो अनजाने में( या अवचेतन रूप से पचांग देखकर)  ‘आषाढ़ का एक दिन’ भी पढ़ा. एक या दो घंटे, जितना भी समय इसे पढ़ते हुए लगा होगा, उतने समय के लिए मैं किसी और दुनिया में पहुँच चुकी थी. शाम की चाय पर इसपर चर्चा चली. माँ ने बहुत कुछ बताया कालिदास के बारे में. और ये पंक्तियाँ सुनाई -


“ सूर सूर तुलसी शशि, उड्गन केशव दास,
अब के कवि  खद्दयोत सम, जहं-तहं करत प्रकाश”


और कहा कि कालिदास भी ‘तब’ के कवि माने जा सकते थे, पर….मैंने इस ‘पर' के आगे पड़ताल नहीं करी. लेकिन हाँ, 'कुमारसंभव' पर जल्द ही धावा बोला जायेगा, ये निश्चय किया.


वैसे इस बीच गाँव में रामलीला खेली जा रही. वो भी हमारे बगीचे के ऊपर वाले खेत में. जितने दिन घर पर थी, मम्मी और मैं रामलीला का लेट-नाईट शो देखने जाते थे. पर मेरी माँ की शिकायत रहती थी कि मैं ज़रूरी संवादों में सो जाया करती थी. जैसे 'लक्ष्मण और परशुराम संवाद' में मैं आधे में सो गयी थी. पर मुझे कोई मलाल नहीं है. क्यूंकि उसमें रामलीला का वो फ्लेवर नहीं था, जिसे में ढूढ़ने गयी थी. वो फल्वौर था-गाँव का फ्लेवर, जिसमें हम किसी पात्र को देखकर चिल्लाते हैं, और कहते हैं “ अरे ये तो सामने वाले ख्यालीराम दर्जी का सबसे छोटा बेटा है!!” और ये  हम ही नहीं चिल्लाते, पूरा गाँव चिल्लाता है. तो ये फ्लेवर मिला हमें दसरथ के मरने पर. जैसे ही कैकयी दसरथ के पाँव पर गिरकर फूट फूटकर रोने लगी, दर्शकों की सीटियों और तालियों के बीच उसका विलाप बिलकुल दब गया. कैकयी बने थे हमारे गाँव की बस के कंडक्टर ‘बीरू’ दा.
मंथरा, कैकयी, भरत, शत्रुघन
ये कहना मुश्किल था कि उन्होंने अपना किरदार कैसे निभाया. उस दिन जब हम वापस आ रहे थे तो पात्रों को मिले इनाम की घोषणा हो रही थी, तब हमने सुना कि कैकयी के पात्र का नाम कहीं नहीं था. हो सकता है, बाद में मिला हो. पर क्या एक आदमी औरत के इस चरित्र को भला इतनी सिद्दत से निभा सकता है ? यूँ तो निर्मल पाण्डेय को एक इतालवी फ़िल्म में ‘ Best Actress Award’ मिला था. पर फ़िर भी क्या अब वक़्त नहीं आ गया है कि गाँवों की रामलीला में भी औरतें ही औरतों के किरदार निभाएं ? खैर , इसपर तो लम्बी बहस हो जाएगी. वो फ़िर कभी.

लेख के अंत पर पहुँचकर लग रहा है कि मुट्ठी ज़्यादा ही भर ली. और जैसे मैंने कहा, कि देने के लिए कुछ नहीं था. जितना देखा सुना, उसे मैं साथ ले आई हूँ. बहुत कुछ है जो कहना है. आज एक ब्लॉग पोस्ट है, कल कोई और रूप होगा.
इन बीते हफ़्तों की यादें और पकेंगी तो और भी कुछ लिखा जायेगा. अभी के लिए फ़िर से अंतराल.


दयौ (बारिश)






Monday, March 21, 2016

शीघ्रपतन

पालतू बनने के डर से,
जब कुछ आदमी  
औरतों की जांघों से निकल गए
वो,
कवि बन गए  
पर वो कवि,
जिनकी कविताओं के पाँव
मासिकधर्म
और गर्भपात जैसे शब्दों ने भारी किये
वो जो
मानने लगे कि
औरत के चंगुल से निकलकर
बुद्ध बना जाता है
पर जिनके रूपकों में
औरत की देह हावी रही  
वो जो
वैश्याओं से
हमदर्दी रखने के खेल के बाद
औरत के सिर्फ़ गर्म ख़याल  
अपने रूपकों में लाये
और फ़िर,
नायक बनकर
जाँघों से बाहर निकल आये
इतना कुछ कह गए वो  
औरतों के बारे में
फिर भी कैसे कहूं मैं ये
कि
ये उनके  
विचारों का शीघ्रपतन था  ?

-प्रकृति करगेती

Friday, March 4, 2016

जानकीपुल में एक नयी कहानी " प्यार का आकार "



 Test.



" प्यार का आकार ". 

<snip>
"प्यार कर बैठने का ख़ुमार, कई दिन उसके साथ रहा. वो प्यार जिससे ‘प्यार की परिभाषा’ लिखी गयी थी. पर प्यार कर बैठने के कुछ दिनों बाद प्यार हाथों से छूटता जाता था. ये बात ‘प्यार की परिभाषा’ में सोच समझकर नहीं लिखी गयी थी, या मिटा दी गयी थी, जैसे कोई गैरज़रूरी जानकारी जिसे अक्सर परिभाषाओं से दूर रखा जाता है. ये परिभाषा के संक्षिप्त होने का रिवाज है, जिसे प्यार के विस्तार पर भी लागू होना पड़ता है."

पूरी कहानी यहाँ पढ़िए: http://www.jankipul.com/2016/03/blog-post_5.html

Wednesday, March 2, 2016

गरम तवा

कुछ जला नहीं था अन्दर
बस धुआँ सा उठा था
जैसे कोई गरम तवा

गरम तवा ,
जिसपर कुछ सेका गया
बिन चिमटे के,
आग छुई
उँगलियों ने

जब सब कुछ सिक गया
सब कुछ पक गया
गरम तवे को
पानी की बौछार के नीचे रख दिया
जिससे उठा
ढेर सारा धुआँ,
जैसे ग़ुबार
जिसे ख़त्म हो जाना था

क्यूंकि
कुछ जला नहीं था अन्दर
बस धुआँ सा उठा था

जैसे कोई गरम तवा

-प्रकृति

Saturday, February 6, 2016

OF SMILES AND SILENCES…

                                                         WP_20141021_00820141021132414
Every morning, at 7:00 am, there is a thud on the door. This is an unusual knock. It is strong, bold and clear. On some mornings, we wake up to this, as if it is our alarm clock. I open the door, sometimes with sleepy eyes and sometimes wide-awake and with hands smeared with flour. Irrespective of what I am doing and thinking, I have been opening the door to a smiling old lady. I always wonder, how her wrinkled face and the old age manage a smile like that. Somehow, she does. With those brimming expression of hers, she hands me the half-litre milk packet. As I take the packet, I am always searching for some words-nice words to say to her. But, it’s too less a time, to gather words from the void and present them to her like an early morning bouquet and see her smile again.
The few moments between she handing over the packet to me and I closing the door, there is always a sense of struggle to try to dig out something for her. But mostly, this early morning meeting has been of smiles and silences. Sometimes, she would break the silence with her signature smile and bless me and my sister. It is not that I have never spoken to her. I know a thing or two about her. From her appearance, she is a petite old Maharashtrian lady in a ‘navaari saari’. And her skin is just like her ‘sari’, wrinkled, yet  tightly tucked. I have seen many older women of her age with their wrinkled skin loosely hanging on their fragile frames. But hers is manifesting the healthy past. Her smile reveals her healthy set of teeth, still shining intact. It’s only her eyes which show the tiredness laced in her heart. While her shoulders stay sturdy, her eyelids seem to droop with responsibilities. Her hands have a strong grip, with which she holds her ‘pishvi’( carry-bag).  And her routine also dictates the same. She is an all-by-herself iron lady, who climbs several steps of four to five storey buildings every day, just to deliver milk packets to homes. If that wasn’t enough to revere her, then should I again say that she does all of this with a lovely smile and bundles of blessings? I mean, how many people do that?

Once I asked her age. She replied “ Ainshi”, meaning eighty. Even at this age, her mind and her body are working in full co-ordination and harmony with each other. She is level-headed, with little arguments for others. She has a sense of good social behaviour, and occasionally  she breaks into jovial conversations with the people she encounters everyday. But, behind all this, resides a person who has accepted life and learned its lessons. I got to know, that her sons have abandoned her. The fact that this old lady is working day in and day out, then there must be no one to look after her. At times, I overhear her talks with my neighbours. I have learnt that her daughters are married and can do little for her, but she blesses them all the same.
While her early mornings are spent on climbing stairs and distributing packets, her afternoons and evenings are spent on a roadside. She spreads a long piece of rug on the roadside to place the items she gets from Dadar station. She sells something, which in Mumbai is called “ Hara masala”, which comprises of kadi-patta, coriander leaves, lemon, ginger, mint and some more similar stuff. But the problem is, all these are perishable. Either they get sold, or get wasted, she has no choice but to go to Dadar Station everyday in the afternoon, which I am sure is a way too tedious for any old lady. But maybe, not for her, as she is an iron-lady.
That’s about the physical pain she takes for work. But, I am guilty of giving her a mental one too. Before, I hadn’t come, my sister would take only one packet of milk on alternate days. But, since the time I arrived, it has changed to one packet every day. Though milk is not an enemy to me, I skipped drinking it at several occasions. So the milk would get wasted. Seeing this, my sister changed it to one packet on alternate days. Then came my other sister from Chennai, and suggested that we should have two packets everyday as she would stay for a couple of days. The lady obliged all the time, with little distress (visible) on her face. When my sister left, we went ahead with alternate days again. Then, finally one day I realized that I am a woman and therefore need calcium! Bingo! What was I doing all this while? So, yes, we have finally requested her to give us one packet everyday. My sister, this time, sensed a bit of discomfort while asking her this. She simply made up a situation that we wish to make curd, and therefore need more milk. She smiled. And I wondered how this lady has been doing the calculations in making the bills, which as per my sister’s testimony, have never gone wrong.
Anyway, the point is, I know a lot about her (or so I think). But, I haven’t found the right words of admiration. During the monsoon, I did give her an umbrella having my selfish motives working behind this. Basically, I was looking for blessings, which I got. But, still I had no words.
I think about her in the train, the streets and all the places where I see beggars stretching their palms (if they are not cut already) towards people, asking for a penny. But, do they realize, it is not just a few pennies they get, but a bagful of pity? Then, I think about this lady who earns her dough with dignity. Yes, of course, I sympathize with her, but I can never pity her. She will always remain an old hunched back iron-lady. But, will I find the right words of admiration for her? Maybe not, maybe never! But thank god, there will always be smiles and silences! And who am I to break this spell.


ठहरे हुये से लोग

हंस में प्रकाशित पहली कहानी- ठहरे हुये से लोग



पिछली रात भी गर्मियों की बाकी रातों जैसी ही थी। माहौल में घुटन फ़ैली थी, जिसे हवा के झौंके तोड़ने की नाक़ाम कोशिश कर रहे थे।  पर रात में  भौंकते कुत्तों से मानो हवा डर जाती हो, और सहमी सी आसपास के  कोनों और दीवारों की दरारों में जाकर छुप जाती हो।
उसी रात, उस बाज़ार में एक जान, रात की बेदर्दी सह रही थी।  मौहाल ख़ुद के साथ उसे भी धीरे-धीरे घोंट रहा था। अधमरी लड़की  घिसटती , लड़खड़ाती , कई दुकानों से टकरायी   वो ख़ून के दाग हर दीवार पर लगाती , आँखिर  में जाकर बुतों की दुकान के ठीक सामने जा गिरी  और रेंगती -रेंगती , सामने रखे गमलों की कतार के पीछे छुप गयी
फिर सुबह हुयी
उस बाजार के शटर नौ बजे खुलते थे शटर के खुलते ही दिखती थी , काँच की दीवारें, जिनके अंदर बुतों का घर था   इस घर में सिर्फ़  एक दरवाज़ा था , पर कोई खिड़की नहीं।  इन बुतों को, खिड़की की कोई ख़ास ज़रूरत नहीं पड़ती , क्योंकि सब वैसे भी पारदर्शी था और  बुत साँसें लेते थे क्या? क्या मालूम! हाँ, लेकिन इन सब के चेहरे थे   कुछ में नैन-नक़्श की बारीकियाँ जरूर दिखती , पर कुछ  बिना नैन-नक़्श के ही शोरूम की रंगत बढ़ाते। जैसेएक दुकान के कोने में रखा एक सुनहरे  चेहरे वाला बुत ! जिन बुतों को आँखें नसीब थी , उन्हें इस बुत से जलन होती हो शायद। उसके कपड़े  भी तो बहुत लुभावने थे , जिनमें  सलवटों का कोई निशान नहीं था , और उसकी पतलून की क्रीज़ ब्लेड जैसी  पैनी थी। इस बुत  के पड़ोसी भी  कोई कम नहीं थे एक बड़े शोख़ अंदाज़ में, लम्बी पोशाक में लिपटी हुई थी वहीं दूसरी, बड़े अल्हड़ अंदाज़ में घुटने  तक की पोशाक में ख़ुद को बिखेरे थी एक हाथ की कोहनी घुटने  पर टेकी हुई  और ठुड्डी को उसी हाथ पर टिकाया हुआ था दूसरा हाथ, बिलकुल बेपरवाह एक तरफ लटका हुआ था पावों के जूते बस एक अंगूठे पर अटके हुए थे, अब गिरे कि तब गिरे। आने-जाने वाले भी उसे रुककर एक नज़र देख लिया करते सोचते होंगे कि बस एक बार छूने की देर है, और ये बुत एकदम उठ खड़ा होगा।
आसपास की  दुकानों में, और भी कई बुत थे एक था , जो तीन मंजिला ईमारत में ऐसे रखा था , मानो आसमान छूता हो। उसके कपड़े  भी ऐसे, जैसे सितारों से जड़ी आसमानी चादर हो। चाँद भी यहाँ आकर, एक दफ़ा  टिक जाता। शहर के इस इस चाँद को, जहाँ सितारे नसीब नहीं होते, यहाँ  रुककर वो भी अपना आसमान पूरा करता होगा
ये सारे बुत, काँच की  दिवारों से झाँकते, इस बाज़ार की  रंगत को बढ़ाते थे इनके मौसम भी बदलते सर्दी, गर्मी, बसंत, सब आता, इनके लिए। बस, दुकानों के कलेक्शन वक़्त पर बदलने चाहिए।  वरना, इन्हें कोई शिकायत नहीं। अब स्टोर-मैनेजर की मर्ज़ी है कि वो इन्हें समय रहते पोशाकों से सजा दे या फ़िर नंगा ही रखे। वो  गर्मियों  का समय था , इसलिए सभी हलके-फ़ुलके, ढ़ीले-ढ़ाले और रंग-बिरंगे कपड़ों में लिपटे हुये थे
सभी दुकानें खुल चुकी थी बुतों की दुकान भी। पर पिछली रात की हक़ीक़त अलसायी सी अभी पसरी हुयी थी   ख़ून के थपके हर जगह थे , पर बाज़ार की अंगड़ाईयाँ  अभी भी बाकी थी   काले ग्रेनाइट और सफ़ेद संगमरमर  पर गाढ़ा ख़ून नज़र नहीं   रहा था हाँ, पर उस अल्हड़ बुत को पास के गमले और उनपर लगे पौंधे कुछ दाग़दार नज़र आये लेकिन, वो दाग़, वो रंग और उनके पीछे छुपी दहशत से वो अनजान थी
बाज़ार धीरे-धीरे भीड़ का स्वागत करने लगा बस, कार , मोटरसाइकल, इनकी गिनती बढ़ने लगी सूरज अपनी रफ़्तार से आसमान नापने लगा अब दोपहर होने को आई थी
बाज़ार अब पूरी तरह चेत गया   चीखने लगा,चिल्लाने लगा   पूरे बाज़ार में हंगामा मच गया गमलों से खींचकर, लाश को बाहर निकाला गया , अटकलें लगायी जा रही थी , तलाशी ली जा रही थी , वगैरह वगैरह।  वो अल्हड़ बुत सब देख रही  थी उसे समझ नहीं रहा था कि ये लड़की बुत कैसे बन गयी  ?  उसके बुत बनने पर इतना हंगामा ? वो बुत समझना चाहती थी  कि आँखिर हो क्या रहा था जब उससे रहा नहीं गया, वो उठ खड़ी हुयी और चुपके से बाहर निकल आयी।
उसने लोगों की ख़ुसरपुसर सुनी, जिससे उसे पता चला कि वो लड़कीमरचुकी थी  यामारीगयी  थी उसे  दोनों ही नहीं समझ आये।  ‘मरनेऔरमारेजाने में क्या अंतर था, ये भी कहाँ से पता होता।  उसने लाश को थोड़ा पास से देखना चाहा। ख़ून से चेहरा लतपथ था, चोटें साफ़ दिखती थी, ख़ासकर माथे की, जिसपर मक्खियाँ भिन-भिना रही थी।  बाल बेतरतीब बिखरे थे और कपड़े जगह-जगह से फ़टे हुए थे। उससे देखा नहीं गया। वो भाग गयी।  भागते-भागते मन में सोच रही  थी  कि येमरनायामारे जाना ‘, जो भी होता  हो, बहुत अज़ीब था इसके बाद इतना हंगामा, इतना शोर-गुल, क्यों?
भागते-भागते उसे ध्यान ही नहीं रहा कि वो कहाँ  निकल आयी। पिछली दहशत से वो बाहर भी नहीं निकली थी, कि आसपास की भागदौड़ देखकर, उसके ज़हन में एक के बाद एक ख़्याल आते गए।   उसने देखा कि उसकी टांगें, उसके हाथ, बाक़ियों के मुक़ाबले ज़्यादा गोरे , साफ़ और नंगे थे   उसने सोचा , जब  लोग ऐसे होते नहीं तो बुतों को ऐसे कपड़े क्यों पहनाते हैं और क्यों ऐसे ढाँचों में डालते हैं? बाक़ी लड़कियों के आँखें, नाक और कान, सभी नैन -नक़्श थे   , पर उसके जैसे नहीं। यहीं सब सोचते हुये, वो एक लड़की से टकरा गयी। गिरने ही वाली थी, पर गिरी नहीं। जो गिरे, वो थे उसके बाल। उसे बहुत शर्मिंदगी हुयी, क्यूँकि जिससे वो टकराई थी, उसके बाल नीचे नहीं गिरे। वो लड़की, कुछ बड़बड़ाती और खिलखिलाती, अपने बाल लहराती आगे निकल गयी। उसे अपने दुकानदार पर बहुत गुस्सा आया। उसे वो दिन याद आया जब, कलेक्शन बदलने के नाम पर उसे पुरे दिन नंगा रखा गया था।  उसे अपने नंगे होने से दिक्क़त होती अगर आने-जाने वाले उसे घूरते नहीं। उन सबकी निगाहें, बस छाती पर आकर अटक जाती थी।
ख़ैर, उसने अपने आप को समेटा और सोचा कि  अब इस ज़िल्लत से बचने का एक ही रास्ता था, कि वो बिना टकराये चले।
वो चलती चली गयी। गाड़ियाँ, जिन्हें  वो बस सामने से दौड़ती देखती थी, उन्हें उसनेमुड़ते-रुकते’, बात-बात पर शोर मचाते, लड़ते-भिड़ते देखा।  और इनमें से एक से बस कुचल ही जाती कि किसीके हाथ ने उसे पीछे खींचकर बचा लिया। वो एक लड़का था।  लड़के ने उसे संभाला और इस बार उसने अपने बालों को। जब ज़रा होश संभले, बुत ने ग़ौर किया कि लड़के की पीठ पर कुछ लदा हुआ था  , जिसपर आड़े-टेड़े अक्षरों में बहुत कुछ लिखा हुआ था बुत ने उससे पूछा, तो पता चला कि उसे इसके पैसे मिलते थे लड़के ने उसे कोने में, जहाँ थोड़ा अँधेरा था, ले जाकर  ये भी दिखाया कि वो बोर्ड जलता भी था जैसे ही अँधेरा हो जाता है, वो उसे जला लेता था   भरी-दोपहरी में वो जलता, और रात के अंधेरों में उसका बोर्ड।
दोनों  ने ख़ूब  बातें करी। लड़के ने अपने काम  के बारे में बताया, जो ज़्यादा कुछ नहीं, बस उस इलाके में घूमते रहना और लोगों को रोक रोककर पर्चियाँ बाटना था। बुत ने भी अपने ठहराव के बारे में बताया, जिससे उस दिन  उसने छुट्टी ली थी दोनों को ही एहसास हुआ कि, वो एक सा ही काम करते थेनुमाइश का बुतकपड़े लपेटकर और लड़का पीठ पर बोझ लादकर। दोनों ही एक इश्तेहार को ढाँचा देते थे- एक चलते-फ़िरते और एक  बुत बनकर।
बुत ने लड़के को दोपहर की बात बताई। लड़के के चेहरे पर कोई ख़ास हैरानी देखकर, उसे मालूम हो गया कि लड़का इस बारे में पहले से जानता था वो सही थी। लड़का उसी इलाके में घूमता था, इसलिए उसे इस घटना की पूरी जानकारी थी। लड़के ने उसे बताया कि उस लड़की कारेपहुआ था।  बुतमरना’ , ‘ मारे जाना’ , इन शब्दों में पहले से उलझी हुई थी, किरेपएक और जुड़ गया।  लड़का इसका मतलब बताने में कतरा रहा था।  वो बस इतना कह पाया कि जब तक बुत शीशों की दीवारों के पीछे थी, उसके साथरेपनहीं हो सकता था। लेकिन अब बुत की चलती-फ़िरती नुमाइश उसे भीरेपका मतलब कभी-भी समझा सकती है- ‘प्रैक्टिकल-एक्सपीरियंसकरा सकती थी बुत ने लड़के को थोड़ा और कुरेदा और जानना चाहा किरेपऐसी क्या चीज़ थी  कि इंसान और बुत के बीच का फ़र्क ही ख़त्म हो जाये! लड़के को ऐसे सवालों के जवाब देना जब मुश्किल लगा, तब उसने हारकर बुत को जकड़ लिया और बुत की टाँगों के बीच हाथ डालकर कहाक्यूँकि तुम्हें बनाने वाला भी ये बनाना नहीं भूला।
बुत ने लड़के को दूर झटक दिया। उसके लिए योनी पर वो दबाव नया नहीं था।  कई बार दुकान के कर्मचारी उसके  टाँगों के बीच हाथ फँसा उसकी जगह बदला करते थे। फ़िर भी लड़के की वो हरक़त उसे पसंद नहीं आई। उसने आगे और कोई सवाल नहीं किया।
बहुत देर हो चुकी थी। लड़के को भी अब जाना था। काफ़ी पर्चियाँ  बांटनी बची थी।  उसने बोर्ड की लाइट जलायी और जाने के लिए तैयार हुआ   जाते-जाते, उसने बुत को एक पर्ची थमाई  और आगे निकल गया।  बुत, दूर से जलते-टिमटिमाते बोर्ड को तब तक देखती रही, जब तक रोशनी धुँधली होकर ग़ुम नहीं हुयी।  उसने लड़के की दी पर्ची पढ़ी। लिखा था-  “पाँच हफ़्तों में वज़न घटाएं, आकर्षक शरीर पायें।और एक तरफ़ बिलकुल उसी की तरह, एक दुबली, पतली लड़की का स्केच बना हुआ था।
वो ज़रा मुस्कुराई और पर्ची को मसलकर  फ़ेंक दिया और आगे निकल गयी। दुकान अभी भी खुली थी। चुपके से अंदर जाते लोगों के साथ, वो भी अंदर चली  गयी और जाकर अपनी पुरानी जगह पर  वापस उसी अल्हड़ अंदाज़ में बैठ गयी।  पर इस बार उसके चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कान भी आकर ठहर गयी कपड़ों के बोझ के अलावा उसपर कोई और बोझ नहीं था।  वो खुश थी कि वो बुत थी। लोग उसी की तरह कपड़े पहनना चाहते थे, उसी की तरह सुन्दर-सुडौल ढाँचे में ढ़लना चाहते थे। और उसका ठिकाना बहार से बेहतर था। शीशों की दीवारों के अंदररेपभी नहीं होते थे।
वो ख़ुद से बेहतर और क्या हो सकती थी -ठहरी  हुई, जिसमें वो अपनी ख़ूबसूरती भी समेटे थी वो काँच के ढाँचो में मेहफ़ूज़ थी, बिना बोझ, बिना ख़ौफ़।  वो मेहफ़ूज़ थी क्यूँकि काँच की दीवारों के अंदर कुछ ज़्यादा महसूस भी नहीं होता