हंस में प्रकाशित पहली कहानी- ठहरे हुये से लोग
पिछली रात भी गर्मियों की बाकी रातों जैसी ही थी। माहौल में घुटन फ़ैली थी, जिसे हवा के झौंके तोड़ने की नाक़ाम कोशिश कर रहे थे। पर रात में भौंकते कुत्तों से मानो हवा डर जाती हो, और सहमी सी आसपास के कोनों और दीवारों की दरारों में जाकर छुप जाती हो।
उसी रात, उस बाज़ार में एक जान, रात की बेदर्दी सह रही थी। मौहाल ख़ुद के साथ उसे भी धीरे-धीरे घोंट रहा था। अधमरी लड़की घिसटती , लड़खड़ाती , कई दुकानों से टकरायी । वो ख़ून के दाग हर दीवार पर लगाती , आँखिर में जाकर बुतों की दुकान के ठीक सामने जा गिरी । और रेंगती -रेंगती , सामने रखे गमलों की कतार के पीछे छुप गयी ।
फिर सुबह हुयी ।
उस बाजार के शटर नौ बजे खुलते थे । शटर के खुलते ही दिखती थी , काँच की दीवारें, जिनके अंदर बुतों का घर था । इस घर में सिर्फ़ एक दरवाज़ा था , पर कोई खिड़की नहीं। इन बुतों को, खिड़की की कोई ख़ास ज़रूरत नहीं पड़ती , क्योंकि सब वैसे भी पारदर्शी था । और बुत साँसें लेते थे क्या? क्या मालूम! हाँ, लेकिन इन सब के चेहरे थे । कुछ में नैन-नक़्श की बारीकियाँ जरूर दिखती , पर कुछ बिना नैन-नक़्श के ही शोरूम की रंगत बढ़ाते। जैसे, एक दुकान के कोने में रखा एक सुनहरे चेहरे वाला बुत ! जिन बुतों को आँखें नसीब थी , उन्हें इस बुत से जलन होती हो शायद। उसके कपड़े भी तो बहुत लुभावने थे , जिनमें सलवटों का कोई निशान नहीं था , और उसकी पतलून की क्रीज़ ब्लेड जैसी पैनी थी। इस बुत के पड़ोसी भी कोई कम नहीं थे । एक बड़े शोख़ अंदाज़ में, लम्बी पोशाक में लिपटी हुई थी । वहीं दूसरी, बड़े अल्हड़ अंदाज़ में घुटने तक की पोशाक में ख़ुद को बिखेरे थी । एक हाथ की कोहनी घुटने पर टेकी हुई और ठुड्डी को उसी हाथ पर टिकाया हुआ था । दूसरा हाथ, बिलकुल बेपरवाह एक तरफ लटका हुआ था । पावों के जूते बस एक अंगूठे पर अटके हुए थे, अब गिरे कि तब गिरे। आने-जाने वाले भी उसे रुककर एक नज़र देख लिया करते । सोचते होंगे कि बस एक बार छूने की देर है, और ये बुत एकदम उठ खड़ा होगा।
आसपास की दुकानों में, और भी कई बुत थे । एक था , जो तीन मंजिला ईमारत में ऐसे रखा था , मानो आसमान छूता हो। उसके कपड़े भी ऐसे, जैसे सितारों से जड़ी आसमानी चादर हो। चाँद भी यहाँ आकर, एक दफ़ा टिक जाता। शहर के इस इस चाँद को, जहाँ सितारे नसीब नहीं होते, यहाँ रुककर वो भी अपना आसमान पूरा करता होगा ।
ये सारे बुत, काँच की दिवारों से झाँकते, इस बाज़ार की रंगत को बढ़ाते थे । इनके मौसम भी बदलते । सर्दी, गर्मी, बसंत, सब आता, इनके लिए। बस, दुकानों के कलेक्शन वक़्त पर बदलने चाहिए। वरना, इन्हें कोई शिकायत नहीं। अब स्टोर-मैनेजर की मर्ज़ी है कि वो इन्हें समय रहते पोशाकों से सजा दे या फ़िर नंगा ही रखे। वो गर्मियों का समय था , इसलिए सभी हलके-फ़ुलके, ढ़ीले-ढ़ाले और रंग-बिरंगे कपड़ों में लिपटे हुये थे ।
सभी दुकानें खुल चुकी थी । बुतों की दुकान भी। पर पिछली रात की हक़ीक़त अलसायी सी अभी पसरी हुयी थी । ख़ून के थपके हर जगह थे , पर बाज़ार की अंगड़ाईयाँ अभी भी बाकी थी । काले ग्रेनाइट और सफ़ेद संगमरमर पर गाढ़ा ख़ून नज़र नहीं आ रहा था । हाँ, पर उस अल्हड़ बुत को पास के गमले और उनपर लगे पौंधे कुछ दाग़दार नज़र आये । लेकिन, वो दाग़, वो रंग और उनके पीछे छुपी दहशत से वो अनजान थी ।
बाज़ार धीरे-धीरे भीड़ का स्वागत करने लगा । बस, कार , मोटरसाइकल, इनकी गिनती बढ़ने लगी । सूरज अपनी रफ़्तार से आसमान नापने लगा । अब दोपहर होने को आई थी ।
बाज़ार अब पूरी तरह चेत गया । चीखने लगा,चिल्लाने लगा । पूरे बाज़ार में हंगामा मच गया । गमलों से खींचकर, लाश को बाहर निकाला गया , अटकलें लगायी जा रही थी , तलाशी ली जा रही थी , वगैरह वगैरह। वो अल्हड़ बुत सब देख रही थी । उसे समझ नहीं आ रहा था कि ये लड़की बुत कैसे बन गयी ? उसके बुत बनने पर इतना हंगामा ? वो बुत समझना चाहती थी कि आँखिर हो क्या रहा था । जब उससे रहा नहीं गया, वो उठ खड़ी हुयी और चुपके से बाहर निकल आयी।
उसने लोगों की ख़ुसरपुसर सुनी, जिससे उसे पता चला कि वो लड़की ‘मर’ चुकी थी या ‘ मारी ‘ गयी थी । उसे दोनों ही नहीं समझ आये। ‘मरने’ और ‘मारे’ जाने में क्या अंतर था, ये भी कहाँ से पता होता। उसने लाश को थोड़ा पास से देखना चाहा। ख़ून से चेहरा लतपथ था, चोटें साफ़ दिखती थी, ख़ासकर माथे की, जिसपर मक्खियाँ भिन-भिना रही थी। बाल बेतरतीब बिखरे थे और कपड़े जगह-जगह से फ़टे हुए थे। उससे देखा नहीं गया। वो भाग गयी। भागते-भागते मन में सोच रही थी कि ये ‘मरना ‘ या ‘मारे जाना ‘, जो भी होता हो, बहुत अज़ीब था । इसके बाद इतना हंगामा, इतना शोर-गुल, क्यों?
भागते-भागते उसे ध्यान ही नहीं रहा कि वो कहाँ निकल आयी। पिछली दहशत से वो बाहर भी नहीं निकली थी, कि आसपास की भागदौड़ देखकर, उसके ज़हन में एक के बाद एक ख़्याल आते गए। उसने देखा कि उसकी टांगें, उसके हाथ, बाक़ियों के मुक़ाबले ज़्यादा गोरे , साफ़ और नंगे थे । उसने सोचा , जब लोग ऐसे होते नहीं तो बुतों को ऐसे कपड़े क्यों पहनाते हैं और क्यों ऐसे ढाँचों में डालते हैं? बाक़ी लड़कियों के आँखें, नाक और कान, सभी नैन -नक़्श थे
, पर उसके जैसे नहीं। यहीं सब सोचते हुये, वो एक लड़की से टकरा गयी। गिरने ही वाली थी, पर गिरी नहीं। जो गिरे, वो थे उसके बाल। उसे बहुत शर्मिंदगी हुयी, क्यूँकि जिससे वो टकराई थी, उसके बाल नीचे नहीं गिरे। वो लड़की, कुछ बड़बड़ाती और खिलखिलाती, अपने बाल लहराती आगे निकल गयी। उसे अपने दुकानदार पर बहुत गुस्सा आया। उसे वो दिन याद आया जब, कलेक्शन बदलने के नाम पर उसे पुरे दिन नंगा रखा गया था। उसे अपने नंगे होने से दिक्क़त न होती अगर आने-जाने वाले उसे घूरते नहीं। उन सबकी निगाहें, बस छाती पर आकर अटक जाती थी।
ख़ैर, उसने अपने आप को समेटा और सोचा कि अब इस ज़िल्लत से बचने का एक ही रास्ता था, कि वो बिना टकराये चले।
वो चलती चली गयी। गाड़ियाँ, जिन्हें वो बस सामने से दौड़ती देखती थी, उन्हें उसने ‘मुड़ते-रुकते’, बात-बात पर शोर मचाते, लड़ते-भिड़ते देखा। और इनमें से एक से बस कुचल ही जाती कि किसीके हाथ ने उसे पीछे खींचकर बचा लिया। वो एक लड़का था। लड़के ने उसे संभाला और इस बार उसने अपने बालों को। जब ज़रा होश संभले, बुत ने ग़ौर किया कि लड़के की पीठ पर कुछ लदा हुआ था , जिसपर आड़े-टेड़े अक्षरों में बहुत कुछ लिखा हुआ था । बुत ने उससे पूछा, तो पता चला कि उसे इसके पैसे मिलते थे । लड़के ने उसे कोने में, जहाँ थोड़ा अँधेरा था, ले जाकर ये भी दिखाया कि वो बोर्ड जलता भी था । जैसे ही अँधेरा हो जाता है, वो उसे जला लेता था । भरी-दोपहरी में वो जलता, और रात के अंधेरों में उसका बोर्ड।
दोनों ने ख़ूब बातें करी। लड़के ने अपने काम के बारे में बताया, जो ज़्यादा कुछ नहीं, बस उस इलाके में घूमते रहना और लोगों को रोक रोककर पर्चियाँ बाटना था। बुत ने भी अपने ठहराव के बारे में बताया, जिससे उस दिन उसने छुट्टी ली थी । दोनों को ही एहसास हुआ कि, वो एक सा ही काम करते थे – नुमाइश का । बुत, कपड़े लपेटकर और लड़का पीठ पर बोझ लादकर। दोनों ही एक इश्तेहार को ढाँचा देते थे- एक चलते-फ़िरते और एक बुत बनकर।
बुत ने लड़के को दोपहर की बात बताई। लड़के के चेहरे पर कोई ख़ास हैरानी न देखकर, उसे मालूम हो गया कि लड़का इस बारे में पहले से जानता था । वो सही थी। लड़का उसी इलाके में घूमता था, इसलिए उसे इस घटना की पूरी जानकारी थी। लड़के ने उसे बताया कि उस लड़की का ‘रेप’ हुआ था। बुत ‘मरना’ , ‘ मारे जाना’ , इन शब्दों में पहले से उलझी हुई थी, कि ‘ रेप’ एक और जुड़ गया। लड़का इसका मतलब बताने में कतरा रहा था। वो बस इतना कह पाया कि जब तक बुत शीशों की दीवारों के पीछे थी, उसके साथ ‘रेप’ नहीं हो सकता था। लेकिन अब बुत की चलती-फ़िरती नुमाइश उसे भी ‘रेप’ का मतलब कभी-भी समझा सकती है- ‘प्रैक्टिकल-एक्सपीरियंस’ करा सकती थी । बुत ने लड़के को थोड़ा और कुरेदा और जानना चाहा कि ‘रेप’ ऐसी क्या चीज़ थी कि इंसान और बुत के बीच का फ़र्क ही ख़त्म हो जाये! लड़के को ऐसे सवालों के जवाब देना जब मुश्किल लगा, तब उसने हारकर बुत को जकड़ लिया और बुत की टाँगों के बीच हाथ डालकर कहा ” क्यूँकि तुम्हें बनाने वाला भी ये बनाना नहीं भूला। ”
बुत ने लड़के को दूर झटक दिया। उसके लिए योनी पर वो दबाव नया नहीं था। कई बार दुकान के कर्मचारी उसके टाँगों के बीच हाथ फँसा उसकी जगह बदला करते थे। फ़िर भी लड़के की वो हरक़त उसे पसंद नहीं आई। उसने आगे और कोई सवाल नहीं किया।
बहुत देर हो चुकी थी। लड़के को भी अब जाना था। काफ़ी पर्चियाँ बांटनी बची थी। उसने बोर्ड की लाइट जलायी और जाने के लिए तैयार हुआ । जाते-जाते, उसने बुत को एक पर्ची थमाई और आगे निकल गया। बुत, दूर से जलते-टिमटिमाते बोर्ड को तब तक देखती रही, जब तक रोशनी धुँधली होकर ग़ुम नहीं हुयी। उसने लड़के की दी पर्ची पढ़ी। लिखा था- “पाँच हफ़्तों में वज़न घटाएं, आकर्षक शरीर पायें”।और एक तरफ़ बिलकुल उसी की तरह, एक दुबली, पतली लड़की का स्केच बना हुआ था।
वो ज़रा मुस्कुराई और पर्ची को मसलकर फ़ेंक दिया और आगे निकल गयी। दुकान अभी भी खुली थी। चुपके से अंदर जाते लोगों के साथ, वो भी अंदर चली गयी और जाकर अपनी पुरानी जगह पर वापस उसी अल्हड़ अंदाज़ में बैठ गयी। पर इस बार उसके चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कान भी आकर ठहर गयी । कपड़ों के बोझ के अलावा उसपर कोई और बोझ नहीं था। वो खुश थी कि वो बुत थी। लोग उसी की तरह कपड़े पहनना चाहते थे, उसी की तरह सुन्दर-सुडौल ढाँचे में ढ़लना चाहते थे। और उसका ठिकाना बहार से बेहतर था। शीशों की दीवारों के अंदर ‘रेप’ भी नहीं होते थे।
वो ख़ुद से बेहतर और क्या हो सकती थी -ठहरी हुई, जिसमें वो अपनी ख़ूबसूरती भी समेटे थी । वो काँच के ढाँचो में मेहफ़ूज़ थी, बिना बोझ, बिना ख़ौफ़। वो मेहफ़ूज़ थी क्यूँकि काँच की दीवारों के अंदर कुछ ज़्यादा महसूस भी नहीं होता ।