एक दोस्त से बात कर रही थी. बातों बातों में ये ख़याल आया कि जब हम दर्द में होते हैं, तब हम मन की इतनी गहरी सतह में पहुँच जाते हैं, जहाँ से बाहर निकलकर हम खूबसूरत सृजन कर जाते हैं. खासकर कलाकार. तो बात का निष्कर्ष ये निकला कि, दर्द कलात्मकता के लिए सबसे उपजाऊ मिट्टी है. यहीं सब सोचते हुए एक कविता का जन्म हुआ. शीर्षक रखा- दर्द की मिट्टी. आज बड़े दिनों बाद ( कम से कम एक साल बाद) मैं ब्लॉग लिख रही हूँ. सोचा क्यों न इसी कविता से शुरू किया जाए. तो कविता आपके समक्ष है:
दर्द की मिट्टी
कला के पनपने के लिए
दर्द
सबसे उपजाऊ मिट्टी होती है
विषयों, अलंकारों और अभिव्यक्तियों के
धूप, खाद और पानी
पड़ते हैं जब उसपर
कला की कोंपलें
दर्द की मिट्टी चीर
फूट पड़ती है
कुछ दोस्त होते हैं
केंचुएं जैसे
तुम्हारे दर्द को समझते
उसे गले लगाते
उसे और तराशते
और हर पड़ाव पर
ये भरोसा दिलाते की
इस कला की फसल को
साकार बनाने के संघर्ष में
तुम अकेले नहीं हो
दर्द की मिट्टी
गाढ़े रंग की होती है
उसमें होता है
तुम्हारी भावनाओं का निचोड़
जिसे गहरी सतह से
खोदकर निकाला जाता है
तुम खुशनसीब हो
अगर
मिली है तुम्हें
दर्द की मिट्टी
जैसी है,
उसे वैसे रहने दो
फलने-फूलने दो,
उगने दो
फसल लहलहाते
जो कहना चाहती है
उसे कहने दो